Thursday, 23 January 2014

अब वो शाम नहीं आती





एक दिन ऑफिस से लौटते वक़्त मैं सोच रहा था कि दिन शुरू  उजेले  से और ख़त्म अँधेरा हो कर क्यों हो जाता है। अब वो वाली शाम क्यों नहीं होती है। वो वाली शाम जो दोपहर की कड़क धुप के बाद आती थी।वो वाली शाम जिसके होते ही माँ बाहर खेलने की इजाज़त दे देती थीं।वो वाली शाम जब पूरा घर साथ बैठ कर चाय पीता था। वो वाली शाम जिसके होते ही पापा के लौटने का वक़्त हो जाता था। वो वाली शाम जब पड़ोसी बच्चो की क्रिकेट बॉल हमारे आँगन में बार बार आती थी।वो वाली शाम जब सब दोस्त पुलिया में बैठ कर बतियाते थे।शाम को दादी गार्डन में पानी डालतीं थीं।दादाजी चिवड़ा खा कर घुमने जाया करते थे।शाम को मोहल्ले में ड्रम बजाता गोलगप्पे वाला भी आता था।
शाम को सूरज हनुमान मंदिर वाले पीपल पेड़ के पीछे से झांकता था और मंदिर की तरह आसमान भी नारंगी हो जाता था।हर मौसम में शाम के अलग ही रंग होते थे। ये सारे नज़ारे हमारे संग होते थे।

अब लगता है शाम हमारे पहरों में नहीं आती।सीधे अँधेरा हो जाता है।दिन की शुरुआत और अंत का पता उजेले और अँधेरे से ही होता है।
शाम 7 बजे हमारे घर में साईं मंदिर से आरती की आवाज आती थी तो इसी बहाने साईं को याद कर लेते थे।अब तो शाम नहीं होती इसीलिए साईं की आवाज़ नहीं आती।इसी बात पर कबीर का एक दोहा याद आता है।-
" पांच पहर धंधे गया, तीन पहर गया सोय।
एक पहर हरि नाम बिन, मुक्ति कैसे होय।।"

4 comments: