ब्लॉग की सब-हैडिंग है "लिखने का मन करता है"।मन एक अलग संसार होता है।सभी का मन अलग अलग संसार है। न जाने कितने पैरेलल यूनिवर्स के माफ़िक। सच में ये मन भी कई मायनों में बाहर के संसार जैसा ही है जिस पर हमारा कण्ट्रोल रख पाना कठिन होता है,नामुमकिन नहीं बोलूँगा नहीं तो कुछ बुध्धिजीवीयो के मन को ठेस पहुँच जायेगी।ये मन ही है जो कई बार बाहर के संसार को भी कण्ट्रोल करता है। तभी हम कहते हैं कि आज मूड नहीं है भाई ये काम कल कर दूंगा पक्का ।मन खुद संसार इसलिए भी है क्योंकि इसमें बाहर की ही तरह कई किरदार होते हैं। कभी मन ही मन किसी को गरिया देते हैं। मन ही मन किसी से बातें कर लेते है। कई बार मन में ही माफ़ी भी मांग लेते हैं। मन की सीमा रेखा ठीक बाहर की तरह हम देख नहीं सकते हैं।मन में ईश्वर भी होता है।
मन के संसार को बाहरी संसार से पवित्र माना गया है। शायद इसीलिए कहा जाता है कि "मन लगा कर पढो बेटा"।मन का लगना पैशन शो करता है आप के किसी भी काम के प्रती।मन से दी गई दुआ भी जल्दी कबूल होती है।
मन वो ही प्लेटफार्म है जहाँ हम खुद से बतिया लिया करते हैं। खुद से मुलाक़ात कर लेते हैं हाल-चाल पूछ लेते है।मन की ताकत भी बड़ी फेमस है। "हमको मन की शक्ती देना मन विजय करें"।
मन पर विजय पाने का आखिर क्या मतलब हो सकता है। कण्ट्रोल कर लेना। शायद मन पर तभी विजय होती होगी जब हमारे मन के संसार में और बाहरी संसार में कोई भेद ना हो। जो हम सोचे वो हम करें।
कई बार बाहरी संसार का मनुष्य संशय रखता है तो पूछ लेता है कि "मन मे कोई डाउट तो नहीं है ना"। मानो ये पूछ रहा हो "आर u सिञ्करोनाईस्ड विथ आउटर वर्ल्ड?"
मन संसार उतना पवित्र भी नहीं है जितना हम सोचते हैं। कई बार मन संसार में ज्यादा रहना,लोग offensive ले लेते हैं।कई बार हमें लोग कहते हैं। "अरे! भाई यहीं हो कि कहीं खो गए हो? मन संसार में गोता लगा रहे छात्र को क्लास से बाहर भी निकाल दिया जाता है। कि क्लास में ध्यान नहीं देता है।
मन संसार में अपराध भी होते हैं।अपराधी न जाने कितने बार बाहरी संसार के अपराध की प्रक्टिस मन संसार में करता होगा।
ये सब मन की उलझन सुलझन के लिए नहीं। मन की ख़ातिर लिख रहा हूँ।इसलिए "लिखने का मन करता है"।
मन के संसार को बाहरी संसार से पवित्र माना गया है। शायद इसीलिए कहा जाता है कि "मन लगा कर पढो बेटा"।मन का लगना पैशन शो करता है आप के किसी भी काम के प्रती।मन से दी गई दुआ भी जल्दी कबूल होती है।
मन वो ही प्लेटफार्म है जहाँ हम खुद से बतिया लिया करते हैं। खुद से मुलाक़ात कर लेते हैं हाल-चाल पूछ लेते है।मन की ताकत भी बड़ी फेमस है। "हमको मन की शक्ती देना मन विजय करें"।
मन पर विजय पाने का आखिर क्या मतलब हो सकता है। कण्ट्रोल कर लेना। शायद मन पर तभी विजय होती होगी जब हमारे मन के संसार में और बाहरी संसार में कोई भेद ना हो। जो हम सोचे वो हम करें।
कई बार बाहरी संसार का मनुष्य संशय रखता है तो पूछ लेता है कि "मन मे कोई डाउट तो नहीं है ना"। मानो ये पूछ रहा हो "आर u सिञ्करोनाईस्ड विथ आउटर वर्ल्ड?"
मन संसार उतना पवित्र भी नहीं है जितना हम सोचते हैं। कई बार मन संसार में ज्यादा रहना,लोग offensive ले लेते हैं।कई बार हमें लोग कहते हैं। "अरे! भाई यहीं हो कि कहीं खो गए हो? मन संसार में गोता लगा रहे छात्र को क्लास से बाहर भी निकाल दिया जाता है। कि क्लास में ध्यान नहीं देता है।
मन संसार में अपराध भी होते हैं।अपराधी न जाने कितने बार बाहरी संसार के अपराध की प्रक्टिस मन संसार में करता होगा।
ये सब मन की उलझन सुलझन के लिए नहीं। मन की ख़ातिर लिख रहा हूँ।इसलिए "लिखने का मन करता है"।







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