Saturday, 27 December 2014

तेरा ठिकाना तो है खुद मेरा ही कपाल।


क्या क्या छुपायेगा रे!!! यहाँ सब दिखता है।
मन की स्लेट पर तू जो कुछ भी लिखता है।
कसम से !! वो तेरी हंसी में दिखता है।
तू ले मजे ज़िन्दगी के इन ओछी हरकतों से।
तू बेताल है!!! ढोते ढोतेे मेरा गणित कमज़ोर हो गया।
मगर याद रखना!!! ऊपर वाला सब हिसाब रखता है।
तू पहन हज़ारो नकाब या अपना चेहरा ही बदल डाल!!!!
तेरा ठिकाना तो है खुद मेरा ही कपाल।
तेरी बुनियाद हिला दूंगा।
तुझे मैं औरों में ना देखूंगा।
दूसरों में कोई खोट नहीं
वो तेरा ही अक्स है जो मुझे दूसरों में दिखता है।
क्या क्या छुपायेगा रे यहाँ सब दिखता है।

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