Saturday, 27 December 2014

रघुराज सिंह स्टेडियम वाला क्रिकेट मैच


गर्मी की छूट्टी का आलम होता था।
सुबह से दोपहर माँ घर से निकलने नहीं देती
कहीँ लल्ला करिया ना हो जाये।
तो सुबह से दोपहर टीवी में क्रिकेट देखते थे।
टॉस जीत के जैसे ही गाँगुली बैटिंग लेता
दादी मोटा चश्मा पहने टीवी से सट के
सचिन और सेहवाग को देखने खड़ी हो जाती थी।
दूसरे ओवर में सेहवाग स्लिप में कैच दे देता था।
दादी का मूड खराब हो जाता "बंद करो टीवी" बोलके
गुस्सा के दोपहर की नींद लेने चली जाती थी।
हम तो टीवी से चिपके रहते।
शाम होते ही कॉल बैल बज जाती।
दोस्त चिल्ला के बोलते कि अभय आज नहीं आएगा।
अभय के पास स्टंप होता था।
अब स्टंप नहीं तो चप्पल लगा के स्टंप बनाते।
दो चप्पल स्टंप की चौड़ाई जितनी रखते थे।
चप्पल वाले स्टंप की लंबाई अंदाजे पर होती थी।
अंदाजा लगाने को अंपायर रखते थे।
डेविड शेफर्ड की कद काठी का मोहित अंपायर बनता था।
टॉस हाथ में छोटा पत्थर रख के कौन से हाथ में है पूछ कर होता था।
तुषार ज्यादा रन पिटाता था।
उसके ओवर को बेबी ओवर कर दिया जाता था।
जब भी बैट्समैन विवेक नाली में बॉल मार देता।
बॉलर तुषार को ही बॉल उठाने जाना पड़ता।
बदला लेने के लिए तुषार गीली नाली वाली टेनिस बॉल बिना टिप्पा खिलाये ही बैट्समैन विवेक को बौल कर देता और नाली वाले छीटें से छर्रा के बॉल स्टंप पे लग जाती।
भड़का विवेक चिल्लाता ### साले बॉल टिप्पा खिला के फेंकता।
बहस होती की ये आउट नहीं है !!!ये ऑउट है!!!
उतने में अंपायर मोहित दलील देता कि
पिछली बार अनन्य को भी छींटा लगा था वो तो आउट मान लिया था। बात निपट जाती।
आकाश अक्सर रन आउट हुआ करता था।
या रन आउट करा देता था।
गौरव बत्रा या राजोरिया जब बैटिंग में आते
तो अंगद की तरह जम जाते।
आउट ना होने की कसम लिए खेलते ही जाते।
मैच खत्म कर के सब आकाश के घर के नीचे पानी पीने जमा हो जाते।
आकाश दोस्तों की भीड़ को बोलता रह जाता "भाई प्लीज गाली जोर से मत दो घर है मेरा"।
मगर दोस्त हैं क्या करे वॉल्यूम कम हो जाता मगर हर सेंटेन्स में दे गाली निकलती।
थक के सब घर चले जाते।
मेहुल मुझे साइकिल में बिठाये टिकरापारा ले आता।
दूसरे दिन फिर शाम होती। और रघुराज सिंह स्टेडियम होता।

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