Saturday, 27 December 2014

शहर


हर दिन मन होता है
कुछ नया करने का।
मन नहीं होता रटी-रटाई
दिनचर्या जीने का।
एक ही ढर्रे पर चल रही
ये ज़िन्दगी पर अभिमान नहीं
मुझे क्रोध हैं।
ये क्या हो गया है हमें
हम इंसान नहीं
कलपुर्जों से बने
रोबोट हैं।
ज़िन्दगी आसान है
मगर आराम नहीं हैं।
हंसते भी बनावटी हैं हम
जैसे अन्दर दिल में कोई
लॉजिकल प्रोग्राम नहीं है।
पूरी ज़िन्दगी भीड़ में अंजानो
के साथ कट रही है।
भीड़ इतनी है कि लोकल ट्रांपोर्ट में
आपस में सट रही है।
कोई मेट्रो के सफ़र में इअर फ़ोन
लगाये टिमटिमाते स्टेशन का इंतज़ार करता है।
कोई ट्रैफिक में फंसे फंसे
शहर को कोसता है।
यहाँ कल्चर नहीं
कोई त्यौहार नहीं है।
गणेश दुर्गा का पंडाल गायब
प्रशाद में मिलता भण्डार नहीं हैं।
यहाँ से निकलना मुश्किल है।
यूँ ही क्यों मन आंसुओ से
आशाओं को सीचता है।
करीयर को रोशन करने
ये चम् चमाता शहर
अपनी ऒर खींचता है।

No comments:

Post a Comment